विश्व हिन्दू परिषद,क्षेत्रीय संगठन मंत्री पूर्वी उत्तर प्रदेश, मा. अंबरीष सिंह जी


               "सदैव की भांति अन्ततः हम ही जीतेंगे"

              चाहे इन्द्रप्रस्थ का वैभव रहा हो,  राजसूय यज्ञ के भव्यतम आयोजन की  प्रसन्नता हो और चाहे कपट पूर्वक जूए में हरा दिये जाने के कारण 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास  हो, चाहे द्रौपदी के वस्त्रहरण का लज्जास्पद प्रसंग हो, चाहे लाक्षागृह का अग्निकाण्ड, "पाण्डव पक्ष" ने कभी एक दूसरे के प्रति अविश्वास नही किया, संकट में हताश हो एक दूसरे पर  आरोप प्रत्यारोप नहीं किये और न ही सफलता में आत्ममुग्ध हो विरोधी पक्ष को कमतर मान उसके समाप्त हो जाने की दम्भोक्ति की और न ही विरोधी शक्तियों की कपट कुचाल और भेद नीति से प्रभावित हो परस्पर एक दूसरे पर अविश्वास ही किया।

             असफलता और सफलता दोनों में सम रहे। सफलता में नेतृत्व की न चारणों की तरह विरुदावली गायी और न ही असफलता में व्यर्थ तर्क गढ़ कर उसकी निन्दा की और उपदेश दिया।

                 संकट और प्रसन्नता को सम भाव से स्वीकार किया परस्पर एक दुसरे के नीति और नियत पर भरोसा किया तब कहीं जाकर कुरुक्षेत्र के समरांगण में भीष्म,द्रोण, कृपाचार्य ,कर्ण के साथ 11 अक्षौहिणी सेना को पराजित कर के धर्मराज्य की स्थापना कर सके।

                   देश ने कोरोना के वैश्विक संकट के प्रथम चरण में देशवासियों ने दुनियां के सम्मुख अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है,इतनी विविधताओं से भरा देश,इतना विशाल देश दुनियां की 138 करोड़ की जनसंख्या को समेटे हुये जिसकी एक बड़ी आबादी घर से सैकड़ों मील दूर रोजगार के लिये रहती हो,बहुत बड़ी आबादी रोज कमा कर खाती हो उसने असीम धैर्य का परिचय दिया, कष्ट सहकर असुविधायें झेलकर इस संकट पर विजय प्राप्त करेंगे इस राष्ट्रीय संकल्प के साथ अपने को जोड़ा ,देश के कोरोना से युद्धरत योद्धाओं ने भी
 गजब की दृढ़ता और जीजिविषा का परिचय दिया।
अत्यन्त कष्ट में अपने घर से दूर रह रहे प्रवासी बन्धुओं की सामूहिक घर वापसी से कुछ समस्याएं पैदा हुईं लेकिन समाज और सरकार के सामूहिक संकल्पशक्ति 
से हमने वह भी बाधा सफलता पूर्वक पार की थी।

कोरोना महामारी का दूसरा चरण अपेक्षाकृत अधिक घातक और डरावना है ,विपत्ति एकसाथ टूटने से व्यवस्थाएं चरमरा गई है , हममें से अनेकों ने
अपने अपनों को खो दिया चिकित्सा उपकरणों
 दवाओं के अभाव में भटके पूरा देश ही बहुत बड़े मानसिक सन्त्रास से गुजर और गुजर रहा है, विपत्ति परस्पर आरोप प्रत्यारोप से समाप्त नहीं होती बल्कि बढ़ती है, यह समय श्रेय लेने या एक  दूसरे को अपराधी ठहराने का नहीं अपितु इस त्रसदी से सामुहिक रूप से लड़ने का है।
           पिछली बार की भांति हम अपने पीड़ित बन्धुओं की सेवा में एक व्यक्ति या  संस्था के नाते कितना सहयोग कर सकते हैं आज हमें यह सुनिश्चित करना है ,देश की तमाम सात्विक शक्तियां इस पुनीत कार्य में लगीं भी हैं अनथक।

                           इस घोर संकट के काल में भी कुछ तत्व जिनसे जिम्मेदार आचरण की देश अपेक्षा कर रहा था उनके द्वारा तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ से वशीभूत जो आचरण किया जा रहा है,व्यवस्था के प्रति असन्तोष और अविश्वास का  वातावरण गढ़ने का दुष्प्रयत्न हो रहा है उन्हें आज अलग थलग कर देना भी हमारा राष्टीय कर्तव्य है।
                               महाभारत काल में सात्विक शक्तियों ने जिन सद्गुणों के बल धर्मयुद्ध जीता था उन्ही सद्गुणों- नेतृत्व पर विश्वास,परस्पर एक दूसरे की भूमिका के आदर , धैर्य,आत्मानुशासन,दृढ़ता और संकल्पशक्ति के बल पर अन्ततः विजय हमारी ही होगी विघ्नसंतोषियो और षड्यंत्रकारियों का पक्ष पराभूत होगा।
      "अपने पर भरोसा अपनों पर भरोसा"
                     अम्बरीष जी 
         विश्व हिन्दू परिषद क्षेत्रीय संगठन मंत्री
                  पूर्वी उत्तर प्रदेश 

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